मूंदी पलकों के नीचे..

सोचो
क्या होता गर आँख बंद कर हम
देख पाते ये दुनिया
पढ़ लेते कितनी और नज़्में, किस्से, कहानियाँ..
जान लेते थोड़ी और बेमतलब की खबरें
कर लेते थोड़ी और tweeting, facebooking, instagramming..
देख लेते थोड़े और TV shows और movies
judge कर लेते थोड़े और चेहरे
कर लेते थोड़ी देर और मन का
सोचो क्या होता 
गर मूंदी पलकों के नीचे से
सुनाई देती खुश्बुएं
जी उठते गुज़रे लम्हात
खुल जाती आंसुओं से हंसी की लड़ियाँ
ख़्वाबों के फूल खिल जाते हकीकत के दरख्तों पर
सोचो ज़रा..

तुम मुझसे मिल लेते
मैं तुमसे
मूंदी पलकों के नीचे..

रात और दिन

रात और दिन
सच में उलटे हैं
जैसे एक ही कोख से जन्मे
दो अलग-अलग फितरत के भाई बहन..

दिन बोलता बहुत है,
लेकिन कुछ कहता नहीं.

रात कुछ नहीं बोलती,
लेकिन बहुत कुछ कह देती है.