एक नज़्म की कोख में

एक नज़्म की कोख में
अनगिनत दर्दों के बीज समाये होते हैं
अल्फ़ाज़ों के रूप में
कभी कागज़ की तो कभी डिजिटल स्क्रीन की ज़मीन पर
पौध से खिल जाते हैं
नज़्म की कोख में ही
उन किस्सों को चेहरे मिलते हैं
जिनको सबसे छुपाकर रखा होता है.

एक हलक में अटकी हुई बात,
एक आंसू के सूखते निशाँ
एक लम्बी खामोश रात
अपने मानी* को मुक़म्मल* होते हैं
नज़्म की कोख में ही.

अनछुए ज़ख्मों को कुरेद कर
पथराई उँगलियों से टटोलकर
ढूंढते हैं वो लम्हात
जो कभी ज़िंदा हुआ करते थे.
नज़्म -
अल्फ़ाज़ दर अलफ़ाज़
एहसास दर एहसास -
सांस भर देती है माज़ी* में.

और जब..
होश आता है
तो हकीकत से दम फूल जाता है
मगर, कागज़ पर एक नज़्म सांस ले रही होती है.. 


मेरे कुछ दोस्त कहते हैं
"यार, अच्छा लिखते हो, और लिखा करो"..


[मानी = Meaning]
[मुक़म्मल = Complete]
[माज़ी = Past]