एक नज़्म की कोख में

एक नज़्म की कोख में
अनगिनत दर्दों के बीज समाये होते हैं
अल्फ़ाज़ों के रूप में
कभी कागज़ की तो कभी डिजिटल स्क्रीन की ज़मीन पर
पौध से खिल जाते हैं
नज़्म की कोख में ही
उन किस्सों को चेहरे मिलते हैं
जिनको सबसे छुपाकर रखा होता है.

एक हलक में अटकी हुई बात,
एक आंसू के सूखते निशाँ
एक लम्बी खामोश रात
अपने मानी* को मुक़म्मल* होते हैं
नज़्म की कोख में ही.

अनछुए ज़ख्मों को कुरेद कर
पथराई उँगलियों से टटोलकर
ढूंढते हैं वो लम्हात
जो कभी ज़िंदा हुआ करते थे.
नज़्म -
अल्फ़ाज़ दर अलफ़ाज़
एहसास दर एहसास -
सांस भर देती है माज़ी* में.

और जब..
होश आता है
तो हकीकत से दम फूल जाता है
मगर, कागज़ पर एक नज़्म सांस ले रही होती है.. 


मेरे कुछ दोस्त कहते हैं
"यार, अच्छा लिखते हो, और लिखा करो"..


[मानी = Meaning]
[मुक़म्मल = Complete]
[माज़ी = Past]

7 comments:

Aanchal said...

Ye toh sach hai ki acha likhte ho... But sach ye bhi hai ki likhne wala hi jaanta hai har shabd ki ehmiyat aur uske peechhe chhupa ek khayal... :)
This one somehow reminded me of the Gulzar's nazm which I shared with you...While reading this one I somewhere felt, my thoughts were coming alive in this piece.
Good one, Aadi ! :)

Digamber Naswa said...

यूँ ही कागज़ पे नज्मों को सांस लेने दिया करो ...

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/09/blog-post_16.html

सुशील कुमार जोशी said...

दोस्त सही कहते हैं :)

shikha varshney said...

वाकई अच्छा लिखते हो... और लिखा करो..

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर ...

Asha Joglekar said...

लिखा करें अचछा जो लिखते हैं।