बादलों के ठिकाने


बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
मोड़ दें घरों की ओर जो कदम, जेबों में वो बेबाक बहाने कहाँ

घर से जब निकले थे तब क्या सोचा था
कि राहों को उम्र से लम्बा पाएंगे
पलटना चाहेंगे कितना ही
मगर पलट न पाएंगे

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
सुकून की नींद जो दे सकें , अब वो गोद के सिरहाने कहाँ

रहते हैं मशगूल अब
दिनों को गुज़ारने में
कभी शामें ज़ाया होती थीं
शर्मा आंटी के घर से बॉल निकालने में

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
ज़िद नहीं बेबसी है, तुम भी निकले हो मनाने कहाँ

तब आँखों में आसमान था
और नज़र में परवाज़ थी
अब आँखों में ज़मीं है
और ज़हन में आवाज़ है

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
वादे किये थे जो, चले थे निभाने कहाँ

जो पाना था वो क्या था
जो पाया है वो क्या है
चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने 
क्या ऐसे ही सोचा होगा?

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
मगर सोचें तो
घर की ओर जाने का
अपनी ज़मीन में मिल जाने का
एक रास्ता है

बस, एक ही रास्ता है.. 

सब कुछ भुला कर
ग़मों को गला कर
खुद को मिटा कर
औरों को जिता कर
बरसना होगा

बस, दिल खोल बरसना होगा..
बादल को
ज़मीन की गोद तभी मिलेगी.

तब 
सौंधी सौंधी महकेगी ज़मीन
और शायद कहेगी
"मेरा बेटा.. घर लौट आया है.."




3 comments:

Vidisha said...

beautiful yaar!!!!!

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/10/2014-13.html

Aadii said...

:)