"अलार्म क्लॉक"


नींदों के भीतर
एक ख़्वाबों की दुनिया है जहाँ
जो चाहो वो होता है
जहाँ ज़िंदा होती हैं चाहें
जहाँ घर होता है

जहाँ एक दिये सी जलती है रात
जिसकी रोशनियाँ पकड़ मैं पार कर जाता हूँ दर्द के भंवर
जिसकी गर्माहट में गुज़र जाती हैं सदियाँ
जहाँ वक़्त थम जाता है
आँखों में एक आंसू सा जम जाता है
जहां खिलते हैं टेसू के फूल हर मौसम में
और हर मौसम में उड़ती हैं पतंगें

नींदों के भीतर
उस ख़्वाबों की दुनिया में
इस ख़्वाबों की दुनिया को भूल जाता हूँ
तभी एक 'एम्बुलेंस' के 'साइरन' सा कुछ सुनाई देता है
साथ एक धुंधला साया दिखाई देता है
और आँख खुल जाती है

"अलार्म क्लॉक" से ये जो ज़्यादती दुश्मनी है मेरी
ये खामखा नहीं है.