रास्ता



मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ
कि ये जो रास्ता है ये अगर थोड़ा कम पथरीला होता
थोड़े कम कांटे और कांच होते इसमें 
कि अगर ये थोड़ा छोटा होता
तो क्या तब भी मंज़िल उतनी ख़ूबसूरत लगती?

और ये भी सोचता हूँ मैं
कि अगर
सफर में जो पड़ाव मिले
ठण्ड में जो अलाव मिले
वहाँ थोड़ी देर और ठहर पाता
थोड़ी देर और रूह सेक पाता
जो यार दोस्त बने, उनसे उतना जुड़ता नहीं
सुकून में शामें फूंक के धुंआ करता नहीं
तो क्या तब भी उन्हें पीछे छोड़ने का दर्द उतना होता?

मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ
कि हर मुकाम आखिर बस एक पड़ाव क्यों है?
कि कैसा जूनून है, सफर से इतना जुड़ाव क्यों है?
कि ख़्वाबों के पीछे जो मंज़िल है, वो कैसी होगी?
कि उस नुक्कड़ पर माँ, क्या अब भी इंतज़ार में खड़ी होगी?
मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ.



2 comments:

Vidisha said...

beautiful poem!

Aadii said...

Thanks :)