वो पहाड़ी रास्तों सी नज़्म


वो पहाड़ी रास्तों सी नज़्म
कभी गिरती ढलान सी
कभी चढ़ती उठान सी

कभी "मानी" झांकते लफ़्ज़ों में से
सतरंगी फूल खिलते हैं जैसे वादी में
- झरोखे किसी दूसरी ही दुनिया के -

कभी "माज़ी" झलकता किसी मिसरे से
लहरें जैसे उठती-बैठती हैं किसी झील में
- ना आता सामने, ना जाता ज़हन से - 

दायें मुड़ जाती कभी
बाएं मुड़ जाती कभी
टेढ़ी-मेढ़ी नर्म-पथरीली
औंधी-सौंधी गर्म-बर्फीली
अपने संग जाने कहाँ-कहाँ ले जाती 
रुकती न वो 
थमती न वो 
मेरे संग चलती जाती
बादलों में उड़ती जाती
वो पहाड़ी रास्तों सी नज़्म.


[*मानी = Meaning]
[*माज़ी = Past]
[*मिसरे, मिसरा = Line]



4 comments:

Vidisha said...

another beautiful piece !

Aadii said...

Thank you Vidisha! :)

Kavita Rawat said...

बहुत सुन्दर ..

संजय भास्‍कर said...

beautiful