दुआ

उस रोज़ जब
तूने अपनी उँगलियों में गंगाजल लेकर
छिड़के थे कुछ छींटे मंतर भरे
और बंद आँखों संग बुदबुदाया था कुछ
ज़्यादा नहीं माँगा होगा तूने माँ
बस यही कि मेरे लाल को नज़र न लगे किसी की 
और इस बार तो कम-से-कम पास हो जाए इम्तेहान में;
तेरी उन दुआओं का ही असर है शायद
मैं वहां हूँ, जहां हूँ...

और अब मेरी बस यही दुआ है कि
एक बार उतनी रूहानियत
उतनी शिद्दत
और उतने ही जतन से
तेरे लिए कुछ मांग पाऊँ...

3 comments:

Vidisha Barwal said...

sundar :)

Anuradha Sharma said...

Behad laa jawaab .. The last line is a serious tear-prompter.

Misha said...

one of my most favorites!!