एक

सुहाने वो दिन थे 
जो बीते थे गलियों की गोद में 
खेलते कूदते भागते
कभी सर पर पैर
कभी पैर पर सर
ना आगे का होश 
ना पीछे की खबर 
गेंद जो उड़ती
हम गेंद हो जाते 
बल्ला जो चलता
हम चलते जाते
भागते भागते 
आसमान पे उड़ते जाते
विकेट जो गिरता 
एक पाले में कभी मुस्कुराते
एक पाले में कभी झुंझलाते
इस सब में 
खेल के संग 
एक हो जाते
ना आगे का होश 
ना पीछे की खबर 
बस होते हम
उस लम्हे में 
उस लम्हे से 
एक! 

2 comments:

Vidisha Barwal said...

गेंद जो उड़ती
हम गेंद हो जाते ....
very nice...pushing mind back to those days jab bachpan mein gali aur sadak pe hi shuru ho jaate the cricket khelna.... :)

Aadii said...

Haha Thanks Vidisha! =)