कागज़ के जहाज़


पगडण्डी पर एक पहाड़ी शहर की 
मैं बढ़े जाता हूँ 
आखिर इस मोड़ के आगे वो घर होगा ये सोच
चलते जाता हूँ.

पता पहचान और मेरे निशान
आँखों में लिखे थे
खारे आबशारों में बहे नहीं मगर
उनकी कब्रें यहीं होंगी कहीं
रूहानी जज़्बों में
या हवाओं पर लिखी नज़्मों में
हवाएं वो जिनमें कागज़ के जहाज़ उड़ाया करते थे
ताली बजा-बजा कूदते 
मानो हम ही उड़ जाया करते थे
कागज़ के जहाज़ जहाँ उतरते 
- कभी किसी पेड़ पर कभी किसी छत पर -
वो अपनी जीत कहलाता
तुम अपने को सिकंदर से कम न समझते
और मैं अपने को जूलियस सीज़र से नीचे न मानता
एक दफे
जब हम लगबघ
आधा शहर और आधी वादी जीत चुके थे
तब तुमने अपनी वादी मेरे नाम कर दी थी
- सारे पेड़ पगडंडियाँ और हवाओं समेत -
आज भी सारी सरज़मीं अपनी लगती है
जब भी इस शहर आता हूँ 
तुम्हारी जीती हुई पगडंडियों पर
चलते जाता हूँ.
मगर ये पगडंडियां हाथों की लकीरों की तरह
ना सुलझती हैं
ना ही मैं रुकता हूँ
चलते जाता हूँ ये सोच-सोच 
कि घर मिलेगा ज़रूर एक दिन "तेरा"
किसी पगडण्डी के पीछे.

मैं चलते जा रहा हूँ
"मेरी" ही तलाश में. 



3 comments:

kaushu400 said...

Very nice Aditya

Vidisha Barwal said...

bahaut hi sundar...

Aadii said...

Thank you!! :)