ज़िंदगी का मतलब


बूढ़े बाबा को घेर के
बच्चों की टोली ने पूछा
बाबा कोई कहानी सुनाओ?
बाबा बोले आज कहानी नहीं
मैं तुम्हे ज़िंदगी का मतलब बताता हूँ
"हैं!! वो क्या होता है?"
बोले बच्चे

बाबा ने पहले आसमान को देखा
लंबी सांस ले शायद महसूस भी किया
फिर आँखें मूंद कर
बोलना शुरू किया

जैसे एक नदी सागर में प्रथक दिखती है
जैसे धुएें में से आग निकलती है
जैसे फलों पर पेड़ लटकते हैं
जैसे बारिश पर बादल ऊगते हैं
वैसी ही है ज़िंदगी

जैसे शाम से पहले आए रात
रात के साथ हो दिन की शुरुआत
दिन में देखें सपने खुली आँखों से
सपनों में दिखे मंज़िल सलाखों से 
वैसी ही है ज़िंदगी

जैसे सुख के ऊपर दुख
और दुख के ऊपर सुख
पीड़ा में हंसी की लहर
हंसी में किसी पीड़ा की कसक
वैसी ही है ज़िंदगी

अगड़म बगड़म
बम बम बोल बम 
अगड़म बगड़म
बम बम बोल बम 
वैसी ही है ज़िंदगी

"बाबा, ये क्या बोल रहे हो..
हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा
इसका तो कुछ मतलब ही नहीं निकला"
बच्चे झल्ला उठे

"Exactly!"
"यही है ज़िन्दगी!"
बाबा हँस कर बोले
और गायब हो गये! 





3 comments:

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2016/09/4.html

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

वाह , बहुत ही अनूठी लेकिन सही परिभाषा जिनदगी की .

Vidisha Barwal said...

haha.. ekdum sahi yara :)