पी वी सिंधु

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वो
एक उन्मुक्त लड़की
गिरी, उठी, सम्भली, चीखी
कभी शेर सा झपटी
कभी बादल सा गरजी
कभी ज़ोर का स्मैश लगाया
कभी फुर्ती से डिफेंस में उठाया
अंडर-डॉग जो कहते थे अब कहाँ हैं
तुमसे न होगा जो कहते थे अब कहाँ हैं
गिरी
उठी
सम्भली
चीखी

~ उड़ी ~

सोना क्या चांदी क्या
तुमने दिखाया है उड़ना क्या
तुम ऐसे ही उड़ती रहो
पी वी सिंधु
तुम ऐसे ही दिल जीतती रहो.



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