ये नज़्म


ये नज़्म, वो नज़्म भी हो सकती थी
जो लिखते लिखते रह गयी हो.

हुआ यूँ 
कि कलम उठाते ही नज़र पड़ गयी 
गुलज़ार वाले पुखराज के चाँद पर
और उसे सीने से लगाए फ़ैज़ के आसमान पर
और दिखी अमृता प्रीतम के स्वच्छन्द इश्क़ की पतंग
जो साहिर और इमरोज़ से होते हुए क़ायनात में उड़ती जा रही थी.

कलम उठाते ही ख़याल आया
कि बड़े शायरों के लफ्ज़ आख़िर क्यों ज़िंदा रहते हैं?
क्यों छू लेते हैं दिल के अनछुये कोने?
आख़िर क्या बात है कि ग़ालिब मियाँ अब भी चैन नहीं पाते?

फिर देखा सामने तो
उड़ते हुए दो पंछी चले जा रहे थे
उड़ान से उनकी थकान को तो अंदाज़ा नहीं हुआ
मगर खुश लग रहे थे
तो शायद घर को ही लौट रहे होंगे
ये नज़्म, वो नज़्म भी हो सकती थी
जो बयां कर पाती उन बच्चों की खुशी
जो घोंसले पर इंतज़ार में बैठे
बस अब कुछ ही देर में चहकने वाले थे.

ये नज़्म,
वो नज़्म होते होते रह गयी!