अपने शहर में

जानी पहचानी गलियाँ
जाने पहचाने नुक्कड़
बातों के पुलिंदे
भर्ता और गक्कड़
अड्डों के चक्कर
दोस्तों से टक्कर
गुड़ की चाय
गली की गाय
सड़क के गड्ढों से भी है पहचान
अपने शहर में!

चाट की चटख
बाज़ार की दमक
गलियों की लचक
धूपबत्ती की महक
रेड़ियों के मेले
क़ुल्फ़ियों के ठेले
भीड़ के हल्ले
रोशन मोहल्ले
दिवाली सी लगे है हर शाम
अपने शहर में!

पुराने रास्तों पर
नयी इमारतों के घर
नये कबूतर हैं बसते अब
मस्जिदों मीनारों पर.
समझे कोई भला?
शहर है या है लड़ी ज़िंदगी की
जहाँ वक़्त ख़ूब ज़ौहर दिखलाता है
कुछ नहीं बदलता लेकिन,
सब कुछ बदल जाता है..
बरसों बाद भी
लगे है दिल को आराम
अपने शहर में!

1 comment:

Vidisha Barwal said...

kyunki apna sheher hota hi hai.. apna! :)

bahaut badhiya!