ग़ज़ल - पानी के नीचे


टूट गए जो शजर* उनकी दास्तान भी खूब रही होगी
कायनात की मार उन्होंने भी खूब सही होगी

पानी के नीचे पैर तो खूब चलाये मगर
थोड़ा और नीचे ज़मीन रही होगी

आँखें अब सूख चुकीं, कुछ नहीं कहतीं
इन में समायी, कभी कोई नदी बही होगी

जाकर देखो उस घर को जिसे छोड़ आये थे
इंतज़ार में वो, अब भी देहरी पर खड़ी होगी

लिख दी जाने कितनी ग़ज़लें उस पर
एक नज़्म कम से कम तो उसने भी कही होगी. 

*शजर =  Tree 

1 comment:

Vidisha Barwal said...

jaise sehmi sehmi sundar nazm... sundar!