गोल गप्पे!

Something I scribbled recently. Apparently regular train rides are good for reminiscing about food! :)
गोल गप्पे!

कह दिया उस रोज़ तुमने 
सुन लिया उस रोज़ मैंने 
कैसे सुना!
कहाँ से आयी इतनी हिम्मत?
कैसे चमकी थी मेरी आँखें! 
और कैसे निकले वो लफ़्ज़ तुम्हारी आँखों से!

वहीं तो खड़े थे हम
जहाँ मिलते थे रोज़ 
उसी नीम के नीचे
उसी चाट वाले के बग़ल में
उसी शाम के वक़्त
जब बाज़ार महक उठता था धूप बत्तियों से
वही गोल गप्पे थे 
खट्टे-मीठे बहुत ही तीखे
तुम्हारी तरह बिलकुल
बिलकुल वही गोल गप्पे थे
लेकिन वही गप्पें नहीं थीं!

तुमने उस रोज़ कह जो दिया था
कहा क्या था, कह कर क़हर सा ढा दिया था
एक सिलसिला ख़त्म कर
एक सिलसिला शुरू कर दिया था 
मेरा तुम्हारी हथेली पर लिखा सवाल, और.. उसका जवाब
जो कितने रोज़ के बाद मिला था
“हाँ!"
जवाब कितना मीठा होगा सोचो
तीखे गोल गप्पों से आँखों में आँसू थे जो
अब मीठे हो चुके थे!




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