ख्वाब और नज़्म

एक ज़हीन सा ख्याल आया कल आधी रात 
तुम थीं या कोई नज़्म?
नज़्म सोच 
तुरंत लिखने को मन किया 
कि कहीं भूल न जाऊं
नींद टूटी तो 
मगर खुमारी कुछ ज़्यादा होगी
जिसे सोचा था कि लिख लिया 
सुबह देखा तो कागज़ कोरा था 

वो खूबसूरत नज़्म
जिससे रूह खिल उठी थी 
भी याद नहीं थी 
बस ये सुकून है 
कि तुम याद भी हो 
और नज़्म सा मुझ पर लिखे भी हुए हो.